"जीवन की विभिन्न कड़ियों के बीच का अंतर स्पष्ट करती: मध्यांतर"


समीक्ष्य पुस्तक: मध्यांतर( कविता संग्रह)
प्रकाशक: हिन्द युग्म
पेज: १६८
मूल्य: ₹१२०
ऑनलाइन उपलब्धता: फ्लिपकार्ट/ अमेज़न/ Kindle
समीक्षक: शिवम खेरवार
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 हिंदी कविता की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि छंदबद्ध रही है। कई विद्वानों के मतानुसार हिंदी मुक्तछंद कविता का पहला श्रेय कवि महेश नारायण को जाता है। आधुनिक काल के एक समय में निराला जी ने भी हिंदी कविता को छंदों की पृष्ठभूमि से परे रखकर नई परिभाषा दी जिसे छंदमुक्त सृजन या छंदमुक्त कविता की श्रेणी में रखा गया। निराला जी की मुक्तछंद रचनाएँ अगर देखी जाएँ तो बिल्कुल उसी कार्यकुशलता का कथ्य और शिल्प देखने को मिलता है जिस तरह वे छंदबद्ध शैली को रचा करते थे। मैं यही कहूँगा कि समय के साथ चलते हुए हिंदी कविता ने जब स्वयं को और विस्तृत आकर देना चाहा, तब छंदमुक्त के रूप में उसने एक नए कहन को जन्म दिया। आधुनिक काल के उस समय से लेकर आज तक मुक्तछंद हिंदी कविता समय के साथ कदमताल मिलाते हुए यथार्थ को रेखांकित करने में सफल रही है। इन कविताओं को बहुत समय तक कई कवियों द्वारा एक लंबे चौड़े कथा रूप में ढाला जाता रहा, उस समय अभिव्यंजना में शब्दों की क्लिष्टता की बखानी भी बहुत हुई। 
         पर अब समय बदला है। अब कविता बीसवीं सदी के पुराने प्रतीक और बिंबों से निकलकर इक्कीसवीं सदी में प्रवेश कर चुकी है। अब कविता ट्रांजिस्टर, रेडियो, कच्ची सड़कों की जगह टीवी, ए. सी., ब्लूएटूथ स्पीकर और इंटरलॉक सड़कों के माध्यम से बात करती हुई मिल जाएगी। जो दशक-दर-दशक भाषा के साथ हुई कविता की मानसिक वृद्धि और समृद्धि को रेखांकित करता है। 
       फ़िलहाल, मुक्तछंद के प्रौढ़ रचनाकारों में एक नाम 'प्रीति अज्ञात' जी का भी उभर कर आ चुका है। प्रीति जी भारत की जानी-मानी ब्लॉग लेखक भी हैं। इनका पहला संग्रह 'मध्यांतर' वर्ष २०१६ में मुक्तछंद कविताओं के रूप में देश के जाने-माने प्रकाशक हिन्द युग्म से आया। जैसा कि पुस्तक का नाम ही किताब के भीतर की सम्पूर्ण विषयवस्तु को रेखांकित करने का माद्दा रखता है। मध्यांतर, मतलब किन्हीं दो के बीच का अंतर। अब ये दो विषयवस्तु भी हो सकती है, दो व्यक्ति, दो विचारधारा या अन्य कुछ भी हो सकता है। इसी एक शब्द के आस-पास की बुनाई इस कविता संग्रह की कविताओं में देखने को मिलेगी। जिसका अर्थ अपने आप में बहुत व्यापक है।
         आज के तकनीकी युग के युवावर्ग में कवि अथवा कवयित्री बन जाने की एक अंधी होड़ देखने को मिल रही है। सब अपने मन से अच्छा लिख रहे हैं, भावनाएँ भी भरने का प्रयास कर रहे हैं मगर कहीं न कहीं कोई एक कड़ी होती है जो उनसे हमेशा छूट जाती है। इस कड़ी के छूटने का कारण मात्र इतना सा है कि आज 'कवि और कविता,' एकमात्र 'फैशन' और इंसानों के निजी वज़ूद को साबित करने का 'ट्रेंड' हो गए हैं। इसी बात का खंडन करती हुई और हक़ीक़त से रूबरू कराती हुई पहली कविता 'कवि' पढ़ने को मिली। उसका एक अंश उपर्युक्त विवेचन पर सटीक बैठता है:

''थक जाओगे जिस दिन/ सबको सँभालते हुए/ उतार फेंकोगे 'महात्मा' का चोला/ खिसिया जाओगे अपनी ही निरर्थक परिभाषाओं से''

 अब इसके बाद का जो पड़ाव होगा, वही आपको एक सार्थक कवि बनाएगा, इस बात का रेखांकन भी बहुत सरल, सटीक और स्पष्ट लहज़े में किया गया है:

"ठीक तब ही अचानक/ टूटेगा सब्र का बाँध/ खिंचेगी हर शिरा-धमनी/ छटपटायेगी वर्षों से ज़ब्त/ असली माँसपेशियाँ भी/भींचोगे मुट्ठी अपनी/ फेंक आओगे उठाकर/ दुनिया के सारे बेहूदा/ नियम-कानून/ न होगा मृत्यु-भय कहीं/ ऐन उसी वक़्त/ चीख़ते हुए बाहर आएगा/ तुम्हारे अंदर का कवि।"

       इसी तरह दूसरी कविता 'एक बोरी आँसू' में विभिन्न सामाजिक विसंगतियों, परेशानियों और कुरीतियों को कविता की पेशानी दुखी मन से कहते हुए मिल जाती है:

''समय की चारपाई में/ कसकर बँधी साँसें/ जूझतीं प्रतिदिन/ विचारों की रस्साकशी से/ जाने क्यूँ/ समाज की खूँटियों पर/ लटके मुर्दा संस्कार/कभी दफ़न ही नहीं होते।''

      इस कविता में एक आह है जो उम्मीद के हरे पेड़ पर चलने वाली नाउम्मीदी की आरी के नापाक मंसूबों को बयाँ करती है। साथ ही आपको ऐसी गलियों में भी ले जाएगी जहाँ हम इंसानी वज़ूद की दुर्दशा के बारे में ज़रूर सोचते हैं। जिससे गुज़रते हुए इंसान को मरहम के रूप में सिर्फ़ 'एक बोरी आँसू' ही नसीब होते हैं।

       कविता 'भीड़,' भीड़तंत्र के शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक पक्ष को रेखांकित करती है। कहते हैं कि भीड़ की कोई जाति और धर्म नहीं होता। और न ही भीड़ को अपने किये का अफ़सोस होता है। प्रीति जी ने बहुत ही माहिर अंदाज़ में सलीक़े से अपनी बात को कह दिया है:

"भीड़ अब व्यथित नहीं/ लज्जित भी नहीं/ रोज़ ही औंधे मुँह/ निर्वस्त्र पड़ी स्वतंत्रता भी/ नहीं खींच पाती ध्यान/ नहीं आता अब कलेजा मुँह को/ उतारी जाती हैं तस्वीरें/ 'प्रथम' होने की होड़ में/ ब्रेकिंग न्यूज़ में बार-बार/ दिखेगा हर कोंण।"

       हम सब भीड़ के द्वारा विभिन्न ख़ूनी वारदातों को अंजाम देने पर भीड़ कोसने की प्रक्रिया शुरू करते हैं उसके बाद पीड़ितों के लिए अगाध संवेदनाएँ व्यक्त करते हुए भले ही उनके लिए न्याय की गुहार करते हैं। पर जितना मैं जान पाया हूँ कि सोशल मीडिया पर लगाये गए न्याय की गुहार के पर्चे दिन-ब-दिन दूसरे पर्चों से दबते जाते हैं और एक दिन किसी रसातल में विलीन हो जाते हैं। तब तक यही भीड़ दूसरी घिनौनी घटना को अंजाम दे चुकी होती है। इसी भीड़ की चरितबखानी करती हुई यह कविता धमनियों में पड़े सुन्न रक्त से उबल जाने के लिए, और हमसे न्याय प्रक्रिया के प्रति सजग रहने के लिए कहती है। 

      किताब की शीर्षक कविता 'मध्यांतर' बढ़ते और बदलते समय के साथ 'फॉरवर्डनेस' में गुम हुए इंसानी जीवन के असली मायनों को रेखांकित करने का प्रयास करती है:

"हाँ, चल तो रही है ज़िन्दगी/उसी दिनचर्या से/ सूर्योदय भी वही है/और सूर्यास्त भी/ दिखाई देती है, पौधों में/ अब भी कलियाँ/ फूल भी खिल रहे हैं/ वही पहले की तरह/ पर फिर भी कोई/ बुझा-बुझा सा है/ क्योंकि बदल गया है अब/ इन सबके बीच का/ वो पहले से समय।"

     कविता 'तुम स्त्री हो' हमेशा से मज़बूत और अव्वल दिखने वाले पुरुष प्रधान समाज में स्त्री के द्वारा असहनीय अत्याचारी हालातों पर ज्वलंत प्रश्नचिन्ह तो लगाती ही है, साथ ही उन सभी क्रूर आत्माओं के गाल पर तमाचा भी मारती है जो स्त्री को केवल घर की शोभा मात्र समझते हैं, उन्हें प्रताड़ित करते हैं जिससे कई बार एक स्त्री डर को अपने आँचल में समेट कर 'मौन' की समाधि में चले जाने के लिए विवश हो जाती है: 

"समय ने और भी गहरा दिए/ गर्त के बादल/ धूल-धूसरित शरीर अब/ खिलता नहीं पहले सा/ 'मौन' ही बन गया पहचान उसकी/ शायद ये प्रायश्चित है/ उसके 'होने' का..'

परंतु फिर भी एक उम्मीद जो नाउम्मीदी में हमेशा एक स्त्री मन में ज़िंदा रहती है को दर्शाने का बहुत ख़ूबसूरत और सकारात्मक प्रयास भी किया गया है: 

"लेकिन डर है/ कहीं उसे इंतज़ार तो नहीं/ कि कोई आकर ढूँढ़ निकालेगा उसे/ उत्खनन में/ फिर पा लेगी वो एक नया नाम"

इतनी नकारात्मक परिस्थितियों में एक संघर्षशील जीवन जीने के पश्चात एक स्त्री के हृदय में एक उम्मीद को जीवित रहते देख एक अजब सी सिहरन के साथ कवि हृदय अचंभित होकर इस कविता में बहुत अनोखा और प्यारा सवाल करता है जो कवि हृदय की विवेचनाशक्ति की ख़ूबसूरती को दर्शाता है:

''हृदय थोड़ा अचंभित और द्रवित हो/ चीत्कार ही उठा सहसा/ तुम 'स्त्री' हो या 'जीवाश्म?''

       प्रीति जी ने अपनी कई कविताओं में प्राकृतिक प्रतीकों और बिंबों का प्रयोग करते हुए कविताओं को एक नया धरातल भी प्रदान किया है। इससे यह ज्ञात होता है कि सीमित प्रतीकों और बिंबों के साथ भी कैनवास को एक विस्तृत आकार दिया जा सकता है। ऐसी ही एक कविता 'क्या किया तुमने' का एक अंश देखिए:

"ये उष्णता, ये उमस/ आग से जलती धरती/ की है कभी, किसी से शिक़ायत?/ उबलता हुआ खलबलाता जल/ स्वतः ही उड़ जाता हूं, बादलों तक/  और झरता है/ शीतल नीर बनकर/ सृष्टि में ये सब होता ही रहा है/ सदैव से, तुम्हारे लिए"

इसी संग्रह में कुछ कविताएँ इंसानी जीवन में जवानी की दहलीज़ पर प्रेम का स्पर्श, ताज़गी, रूमानियत संघर्ष, कष्ट और परिपक्वता की ओर इस पहले क़दम की महत्ता को बयाँ करती हैं। इन कविताओं में 'अनुपम पल' और 'आख़िरी ख़त' मेरी प्रिय रहीं। 

     "यकायक खो गए/ शब्दों के मायने/ सुर्ख़ यादें, झर रहीं/ पीले पत्तों सी/ व्यथित हृदय/ पूछता सवाल/ दोषी कौन?/ बहते जवाब/ अर्थ बन/ मुर्दा आँखों से"

'आख़िरी ख़त' को पढ़ते समय कुछ पंक्तियों का यह हिस्सा मेरी आँखों में जम गया और मेरे रोंगटे खड़े हो गए। 

     आज के दौर के अछूता और सबसे प्रासंगिक विषय 'धर्म' पर लिखी कविता समाज में व्याप्त आडम्बरी धर्म की कलई खोलता है। इस धर्म के पीछे के सारे दो नम्बरी मंसूबों की बयानी करती यह कविता सचबयानी की कड़ी में अग्रणी साबित होती है:

"धर्म एक सुनहरा पासा है/ जनता की आँख में झाँसा है
चौपड़ पे उछलती गोटी है/ आहों से सुलगती रोटी है"

       कविता 'माँ कहती थीं' एक बेटी के लिए स्वाभाविक रूप से होने वाली माँ की चिंता का बखान करती है:

"माँ हरदम कहती थीं/ दुनिया उतनी अच्छी नहीं/ जितनी तुम माने बैठी हो/ और मैं तुरंत ही/ चार अच्छे दोस्तों के नाम गिना दिया करती"

अक्सर यही होता भी है कि जब तक बच्चे उम्र और अनुभव की दहलीज़ पर कच्चे होते हैं, तो उन्हें मम्मी-पापा की अनमोल बातें केवल दिमाग़ ख़राब करने वाली ही लगती हैं पर वही बातें उन्हें तब समझ आती हैं जब वो ख़ुद उस दहलीज़ पर होते हैं, जिस पर कभी उनके मम्मी-पापा हुआ करते थे। इसी का एक अंश कविता में भी है:

"देखो न, अब मैं भी/ दोहराने लगी हूँ यही सब/ अपनी ही बेटी के साथ/ सीख गई हूँ बड़बड़ाना/  और हँसते-हँसते रो देना/ समाचारों को देख/  पागलपन की हद तक/ खीझती-चीख़ती भी हूँ/ माँ आजकल, कुछ नहीं कहतीं/ बस, उदास चेहरा लिए/ हैरानगी से देखती हैं मुझे।"

      कविता 'मृत्यु,' मृत्यु के सही आयामों पर प्रकाश डालती है। इसमें सही ही कहा है प्रीति जी ने। यह अधोलिखित अंश ज़ेहन की मृत नाड़ियों को ज़िंदा करने की सामर्थ्य रखता है:

"क्या कभी किसी असहाय को/ घिसटकर चलते देखा है?/ तलाशा है मुँदी आँखों से टटोलते हुए/ कोई सुरक्षित कोना? चौराहे पर बिलखते मासूम बचपन से/ जीने की वजह/ या सर पर ईंटें ढोते/ पसीने से लथपथ चेहरों को झिंझोड़कर जानना चाहा?/ कि ये किससे शिक़ायत करते हैं?/ कहाँ माथा पटकते हैं? किस पर दोष मढ़ते हैं?/ आख़िर ये सब हारकर क्यों नहीं मरते हैं?"

यह अंश बताता है कि संघर्षशील होने के बावज़ूद मृत्युवरण किसी भी समस्या का निदान नहीं होता। एक सकारात्मक ऊर्जा देती हुई यह कविता लेखनी की परिपक्वता को रेखांकित करती है।
    
      पूरा संग्रह पढ़ने के उपरांत मैं यह सुनिश्चित करने में असफल रहा कि किस कविता को सर्वश्रेष्ठ कहूँ और किसको कमतर। सारी ही कविताओं के विषय प्रासंगिक हैं। इनमें से अधिकतर सामाजिक विषय पर गढ़ी गयी कविताएँ हैं। मेरे अनुसार इन सारे विषयों पर स्वच्छन्दतापूर्वक क़लम चलाना आवश्यक भी था, जो कि हर कवि/ लेखक को होना भी चाहिए। क्योंकि अगर रचनाकार दौर-ए-हाज़िर की लीक को पकड़े बिना ही सृजनरत रहता है तो उसका लेखन मेरे हिसाब से निरर्थक है क्योंकि जो लेखन जगत को एक सही दिशा निर्धारण नहीं दे सकता, वो केवल अमुक रचनाकार की निजी महत्वकांक्षा सिद्ध करने के लिए हो सकता है। पर प्रीति जी मूल्यांकन की इस सबसे बड़ी और चुनौतीपूर्ण परीक्षा को पास करने में सफल रहीं। 

      भले ही गिनी- चुनी कुछ जगह संग्रह में वर्तनीगत/व्याकरणिक विषमताएँ देखने को मिलीं और कुछ आवश्यक जगह कविताओं में एक सीधे-सपाट कथ्य का होना भी मिला पर इससे इस संग्रह के प्रभावी स्वरूप पर रत्तीभर आँच नहीं आई। एक और बात जो मुझे अधिकतर किसी न किसी रचनाकार के काव्य संग्रह में खटकती है। वो यह कि कविताओं को क़िताब में रखने का एक सही क्रम विरले काव्य संग्रह में देखने को मिलता है। ऐसा तब होता है जब हमारे पास संग्रह को देने के लिए या तो पर्याप्त समय न हो या फिर एक संग्रह विश्लेषक की कमी हो। आजकल के प्रकाशक उपर्युक्त दूसरे बिंदु के लिए अधिकतर उत्तरदायी होते हैं। इसके अलावा कुछ ऐसी कविताएँ रहीं जो छंदबद्ध आधार की ओर बढ़ने का प्रयास करती हुई नज़र आईं। यह कवयित्री के लिए एक शुभ संकेत है जिसके आधार पर कवयित्री हिंदी कविता की छंदबद्ध विधाओं पर भी लेखनी चला सकती हैं। पर कहीं न कहीं पूरी तरह व्याकरणिक मानकों पर पुष्ट न होने की वजह से ये संग्रह का लालित्य कम कर रही हैं। आशा करता हूँ कि अगले संस्करण में इन सारी बातों का ध्यान रखा जाएगा। एक स्त्री होने के नाते स्त्री जीवन संबंधित गंभीर विषयों का बहुत बारीकी से अवलोकन करके उन्हें कविताओं में सहजता से ले आना प्रीति जी की लेखन कार्यकुशलता का प्रमाण है। इस संग्रह की ख़ूबसूरती यह भी है कि यह आमजन से प्रबुद्धवर्ग, सभी के लिए पठनीय और संग्रहणीय है। कुल मिलाकर यह चौरासी कविताओं का एक अच्छा दस्तावेज़ है जिससे हम जीवन जीने की कला को अपने भीतर आत्मसात कर सकते हैं। कविता के साथ गद्य के अलौकिक आकाश में प्रीति जी की कविताओं के सितारे ख़ूब चमकें, यही मंगलकामना करता हूँ। 

Comments

  1. बहुत सुंदर भाषा शैली ,शब्द संयोजन.।पुस्तक की कीमत बढ़ा दी आपकी समीक्षा ने ।
    बधाई प्रीति के साथ आपको भी💐💐💐

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  2. धन्यवाद, शिवम

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  3. वाह👌 अद्भुत समीक्षा

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